Thursday, September 13, 2018

秘鲁成立环保部对抗击气候变化

路透社》周二报道,秘鲁总统加西亚成立了首个秘鲁环保部。科学家称,气候变化正严重地影响安第斯山脉国家,安第斯山脉上的冰川因此可能在25年后完全融化。 加西亚总统说:"秘鲁环保部将…让我们保护秘鲁免于遭受全球变暖的危害,以及淡水缺乏和冰川消融的威胁。

报道说,森林可以吸收二氧化碳,从而保护这个国家大面积的亚马逊热带雨林会对抗击气候变化起重要的作用。加西亚总统还呼吁各国政府通过征收化石燃料税以建立全球重新造林基金。

秘鲁的采矿公司反对这一环保部门的成立。他们说,这将减缓目前项目的进度速度,同时也不利对铜,锌,金矿等开采的投资。秘鲁是全球矿物的的主要生产国。国《卫报》报道, 因西班牙正遭受有记录以来的最为严重的旱灾,一艘载有二千三百万升饮用水的货轮周二抵达了西班牙海港城市巴塞罗那,以缓解正处于旅游旺季的当地对用水的需求。 报道说,加泰罗尼亚自治区地区的水库储水量现已下降到只略高于正常库容四分之一的水平,为一年前库容量的一半。巴塞罗那是这一自治区的首府。

西班牙将耗资二千二百万欧元(约三百四千万美元)进行一项前所未有的紧急运水计划。在接下来的三月内,每月将有六艘来自西班牙南部的货船向巴塞罗那送水。
据中国官方媒体周三报道,因周一发生在中国西南地区极具破坏性的地震,四川省紫坪铺水电工程出现了严重裂缝。据报道,已有近1.5万人死于这场7.9级的地震。
该报道说,该核电厂及相关建筑物已倒塌。 有些建筑物是"部分陷落"。四川省级政府表明,整个电站机组现全部停机。

位于岷江上游的紫坪铺水电站工程于2006年全部投产。它是中国西部大开发计划中十大标志性工程之一。
英国《卫报》周二报道,由于全球粮食价格继续飙升,阿富汗农民希望充分利用这一机会以种植小麦代替罂粟作物来获得更大的收益。
该报道说,今年阿富汗一吨小麦的价格已差不多上涨了两倍,从而造成严重的粮食短缺。预测,明年小麦的收成将显著增加。

联合国粮食和农业组织的 被引述说:"高价格的商品粮已鼓励农民从罂粟种植向小麦种植转移。事实上,我们已看到了这一转变的现象,例如在巴米扬地区,有些农民已种植了一半小麦和一半罂粟" 。
英国《卫报》周二报道,由于全球粮食价格继续飙升,阿富汗农民希望充分利用这一机会以种植小麦代替罂粟作物来获得更大的收益。
该报道说,今年阿富汗一吨小麦的价格已差不多上涨了两倍,从而造成严重的粮食短缺。预测,明年小麦的收成将显著增加。

联合国粮食和农业组织的 被引述说:"高价格的商品粮已鼓励农民从罂粟种植向小麦种植转移。事实上,我们已看到了这一转变的现象,例如在巴米扬地区,有些农民已种植了一半小麦和一半罂粟" 。

Tuesday, September 11, 2018

洁净能源立法可使菲律宾节省近30亿美元

律宾大学和世界自然基金会的一联合报告指出,该国参议院经19年的努力而最终通过了《可再生能源法》。该立法可帮助该国节省资金达29亿多美元。 该报告说,如果菲律宾将可再生能源发电比例从0.16% 提升到
41%,就可以大量节省进口能源的费用。
该国可利用的可再生能源包括风能、太阳能、海洋、(合理开发的)水电和生物质能。

可再生能源联盟发言人凯瑟琳•玛塞达说,可再生能源发电节省下来的资金可用于一些社会和基础设施项目建设。"这笔钱可以建25万个教室,让1,700万个孩子上学,开设13.5万个健康中心,解决300万户家庭的吃饭问题,并修通3.8万公里的从农场到市场的公路。"

这一具里程碑意义的立法为投资者提供了各种鼓励措施,其目的在于促进菲律宾丰富可再生能源资源的开发和使用。
世界自然基金会的一最新报告说,全球气温每上升2摄氏度就可能导致1/2甚至高达3/4的主要南极企鹅群的减少和消亡。
该报告指出,50 %的帝企鹅和75 %的阿德利企鹅的生存正在受到威胁。

全球气温上升导致帝企鹅和阿德利企鹅在南大洋的重要筑巢和觅食地的消失。这主要体现在冰层的融化及其引起的企鹅的重要食物来源—磷虾种群的减少。

很多科学家认为,全球平均气温如果比工业化前水平提升2摄氏度,那就会带来让人无法接受的灾难性气候变化结果。根据大多数气候变化模型的预测,这种变化将在不到40年内发生。
麻省理工学院的研究报告指出,中国空气污染的主要原因不是能源技术低或者政府监管不足,关键问题在于能源市场、商业压力以及新型政府管理之间的复杂关系和相互影响。
通过对14个省份85个发电厂的几十个经理的调查,该报告指出,虽然大多数新工厂已达到非常高的技术标准,但是它们在运作方式及其所用煤炭种类存在问题。

新的市场压力鼓励工厂管理人购买最廉价、质量最差、以及污染最严重的煤炭。与此同时,他们还将昂贵的烟囱洗涤器或其他清理装置闲置不用。

参与报告写作的爱德华• 斯坦富徳副教授说,随着管理能力及有利市场价格机制实施的加强,这一状况可通过相应改革而得到较快改善。而且,可改进的程度比一般人想象的要深。
据《路透社》报道,《生物多样性公约》总干事艾哈迈德•朱格拉夫说,为达到保护动物和植物的目的,世界各地的城市需要在发展进程中进行资源回收并加大绿化力度。
朱格拉夫说,都市地区仅覆盖2 %的地球陆地面积,但这些地区却使用了世界75 %的自然资源。

他进一步说,与发达国家相比,发展中国家的城市化进程很快,
据《卫报》报道,科学家说,农民将可在4至5年内开始种植耐旱的转基因作物。
位于美国安大略省金斯顿市的"植物性能公司"首席执行官大伟•
戴维斯说,该公司已开发了多个耐旱油菜和玉米的新品种。实验表明,这些新品种可在最缺水情况下比原作物品种增产40%。

据预测,全球变暖将降低发展中国家耕地的质量和产量。转基因作物的倡导者称,耐旱作物将可极大地适应气候变化带来的新挑战。

但是,反对者说,科学家们夸大了转基因作物的优点。地球之友的奧克斯•博罗说,"我们对这些新品种的性能不必太在意,因为之前已经听到很多同样的说法"
并在城市规划中面临生物保护的问题。但这一发展过程不应以牺牲生物多样性为代价。

根据联合国统计,一半的世界人口现生活在都市。到2050年为止,这一比例将上升到近7成。
在印尼计划砍伐大面积雨林来发展棕榈油之际,环保人士指出,这个国家需要加大力度来保护其遭受破坏的巴布亚雨林。
印尼是世界最大的棕榈油产地。
该行业在印尼的发展因造成了热带雨林和野生物种的损害而受到尖锐的批评。据《路透社》报道,为给棕榈油种植让地,该国预计在巴布亚省砍伐6万公顷的雨林。该省份包括新几内亚岛西部的很大一部分。而此前,印尼承诺通过国际碳交易项目来保护其雨林。

世界粮油组织说,印度尼西亚是世界上森林砍伐速度最快的国家。该国每年约有一百九十万公顷的林木遭到破坏。

Wednesday, September 5, 2018

ड़े हो रहे हैं. पर वो न तो ख़ुद खेती में लौटना चाहते हैं

हरपाल को सरकार से किसी भी तरह का मुआवज़ा नहीं मिला है. पति की मौत के बाद अब हरपाल के लिए ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो गई है. क़र्ज़, बेटे की पढ़ाई और बेटी की शादी– तीन पहाड़ जैसी मुश्किलें हर रोज़ उनका पीछा करती हैं.
वह कहती हैं, “पशुओं का दूध बेचकर किसी तरह रोटी का इंतज़ाम करती हूं पर बाक़ी सब ठप पड़ा है. पिता की मौत के बाद मेरा बेटा पहली बार परीक्षाओं में फ़ेल हुआ. बेटी की शादी के लिए रिश्ते नहीं मिल रहे हैं. कोई हमारे यहाँ शादी ही नहीं करना चाहता. सबको लगता है इस घर में मौतों का डेरा है. अब तो मुझे भी लगने लगा है कि हमारे घर में ही कुछ ग़लत होगा. अपने रिश्तेदार भी घर आने से कतराते हैं. उनके बिना कहीं आने जाने के लिए भी पड़ोसियों की मोहताज हो गई हूँ. आगे क्या होगा कुछ समझ नहीं आता”.
जिस पंजाब को ज़्यादातर उत्तर भारतीय जनमानस हरित क्रांति, समृद्धि, भांगड़ा और ख़ुशहाल किसानों से जोड़ता हैं, वहां की ज़मीनी सच्चाई आज मुख्तियार जैसे किसानों की कहानियों से भरी पड़ी है.
पंजाब सरकार की ओर से राज्य के तीन विश्वविद्यालयों की मदद से कराए गए पहले आधिकारी ‘डोर-टू-डोर’ सर्वे के मुताबिक़ पंजाब में वर्ष 2000 और 2015 के बीच  , किसानों ने आत्महत्या कर ली.
इन 16,606 किसानों में कुल 87 प्रतिशत मामलों में किसानों ने खेती से जुड़े ख़र्चों के लिए कर्ज़ लिया था और फिर उसे चुका न पाने की वजह से उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली.
सरकारी आंकड़ो से बनी पंजाब की यह भयावय तस्वीर अभी पूरी नहीं होती. आगे यह भी जानिए कि अपनी जान ख़ुद लेने वाले इन किसानों में 76 प्रतिशत छोटे किसान हैं जिनके पास 5 एकड़ से भी कम ज़मीनें हैं.
मनसा ज़िले के भीमकालं गांव में हमारी मुलाक़ात एक ऐसे ही खेतिहर मज़दूर परिवार से होती है. इस परिवार की मुखिया हैं 50 वर्षीय बलदेव कौर.
बलदेव यूं तो पढ़ी लिखी नहीं हैं लेकिन पहले पति और फिर जवान बेटे की आत्महत्याओं ने उन्हें कवि बना दिया. उन्होंने अपना दुख पड़ोसियों को गाकर सुनाना शुरू किया और धीरे धीरे अपनों की मौत पर गीत बना लिए. आज उनके गीत ज़िले में किसानों के हक़ के लिए होने वाले विरोध प्रदर्शनों के ‘ऐन्थम सांग’ में बदल गए हैं.
अपनी भारी आवाज़ में सुर लगाकर ‘ख़ुदकुशियों दे राहें जित्ते प्यो दे पुत चले’ (ख़ुदकुशी की राह पर जिसके पति और बच्चे चले) गाती हुई बलदेव उदासी के साथ साथ संघर्ष की भी ज़िंदा तस्वीर लगती हैं.
हर मज़दूर हैं. हमारे पास अपनी कोई ज़मीन नहीं. इसलिए मेरे पति सिर्फ़ 8000 रुपए साल पर ज़मीनदारों के खेत में मज़दूरी किया करते थे. हम पर कर्ज़ा था और क़र्ज़ न उतार पाने की सूरत में मेरे पति ने घर बेच देने का भी क़रार किया हुआ था. हम कर्ज़ चुका नहीं पाए और मेरे पति ने स्प्रे पीकर आत्महत्या कर ली. मरने से पहले वो बहुत छटपटाए थे. फिर मैंने मज़दूरी करके अपने बच्चों को बड़ा किया. हमारे पास घर भी नहीं था. बारिश में मेरी झोपड़ी से पानी टपकने लगता और मैं बच्चों को एक कोने में लिए पड़ी रहती.
मैंने कर्ज़ा उतारने के लिए लोगों के खेतों और घरों में सब जगह काम किया. रोना आता पर गोबर तक साफ़ किया मैंने. लेकिन फिर भी कर्ज़ा न उतरा”.
कर्ज़ उतारने के लिए बलदेव का बेटा कुलविंदर 15 साल की उम्र से ही लेनदार ज़मीनदारों के यहां काम करने लगा.
मज़दूरी करते-करते ही 21 साल की उम्र में उनकी शादी करवा दी गई. उनका पहला बेटा सिर्फ़ 4 महीने का था जब कुलविंदर ने कीटनाशक पी कर ख़ुदकुशी कर ली. बलदेव के परिवार को दो आत्महत्याओं के बाद भी कोई मुआवज़ा नहीं मिला.
गाते गाते बलदेव का गला रुंध जाता है. दुपट्टे से आंसू पोछते हुए वो कहती हैं, “मुझे डर था इसलिए मैंने बेटे को नहीं बताया था कि हम पर कितना कर्ज़ है. पर वो बार-बार पूछता.
कहता माँ सच बता हम पर कितना कर्ज़ा है. फिर एक दिन उसे पता चल गया और उसने कहा कि हम कभी इतना कर्ज़ नहीं चुका पाएँगे. मैं चाहे कितनी भी हिम्मत बँधाती, पर वो अंदर से टूट चुका था.”
में पंजाब सरकार ने किसान आत्महत्याओं के लिए एक नई ‘मुआवज़ा और राहत नीति’ को लागू किया. 2001 से पाँचवी बार बदली गयी इस नीति के तहत अब किसान आत्महत्याओं के सभी मामलों में पीड़ित परिवार को 3 लाख रुपए दिए जाने का प्रवधान है. साथ ही किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनज़र पंजाब सरकार ने दो कमेटियों का गठन किया है. सुखबिंदर सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में ग्रामीण आत्महत्याओं के लिए बनी ‘विधान सभा कमेटी’ और टी हक़ की अध्यक्षता में बनी ‘ऋण छूट समिति’. इन कमेटियों ने ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़ाने से लेकर ‘ऋण छूट’ तक पर किसानों के पक्ष में अपनी सिफ़ारिशें तो दे दीं हैं लेकिन उन पर ज़मीनी कार्रवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर सुखपाल सिंह लंबे समय से पंजाब में बढ़ते कृषि संकट पर काम कर रहे हैं. वे राज्य सरकार की ओर से कराए गए ‘डोर टू डोर’ सर्वे के समन्वयक भी रहे हैं. बीबीसी से एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि किसानी में चल रही ‘व्यापार की शर्तें’ किसानों के पक्ष में नहीं जा रहीं.
“बीजों से लेकर खाद, पानी और कीटनाशकों तक पर होने वाले ख़र्च बढ़ते जा रहे हैं और किसान की आमदनी उस हिसाब से बढ़ नहीं रही. यह बढ़ते क़र्ज़ और आत्महत्याओं के पीछे एक बड़ी वजह है. हालात ये है कि पहले जहां पंजाब की कुल कामगार जनसंख्या में से 63 प्रतिशत लोग किसानी थे, वहीं आज राज्य के सिर्फ़ 35 प्रतिशत लोग ही खेती कर रहे हैं.इस 35 प्रतिशत में भी सिर्फ़ 20 प्रतिशत किसान हैं, बाक़ी खेतिहर मज़दूर”.
आगे बरनाला ज़िले के ही बदरा गांव में हमारी मुलाक़ात गुरतेज दास से होती है. 45 वर्षीय गुरतेज के घर में कोई महिला नहीं हैं.
गांव की मुख्य सड़क पर बने एक बदरंग धूल भरे घर में रहने वाले इस हिंदू किसान परिवार के पास सिर्फ़ एक एकड़ ज़मीन है. एक दशक पहले यह परिवार ज़मीन किराए पर लेकर खेती करता था. लेकिन जिस दिन गुरतेज के बड़े भाई निर्मल दास ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या की, उसी दिन यह परिवार बिखर गया.
गुरतेज ने अपना जीवन बड़े भाई के बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करने में लगा दिया. निर्मल के जाने के बाद गांव वालों ने बच्चों की माँ और बड़े भाई की पत्नी सरबजीत कौर से उनका विवाह भी करवा दिया था.
पर सरबजीत उनको और अपने बच्चों को छोड़ कर चली गईं. बिन माँ के बच्चों को बड़ा करना गुरतेज के लिए एक ऐसी चुनौती थी जिसका सामना करने के लिए न तो वह मानसिक तौर पर तैयार थे और न ही आर्थिक.
अपनी धूल भरी रसोई में चाय बानते हुए वह कहते हैं, “जब बच्चों की माँ गई तब छोटा वाला सिर्फ़ 6 साल का था. रातों को उठकर रोता था. अक्सर बीमार पड़ जाता. मुझसे जैसे बनता मैं वैसे खाना बनाकर बच्चों को खिलाता और उनकी देखभाल करता. उनको नहलाता, कपड़े पहनाता और सारे काम करता. फिर मज़दूरी करने जाता और वापस आकर उन्हें खाना बनाकर खिलाता.”