Friday, August 31, 2018

नज़रबंद रहेंगे गिरफ़्तार 'मानवाधिकार कार्यकर्ता'

महज 17 साल की उम्र में किसी भी लोकगायिका के लिए "बिहार की तीजनबाई" जैसा उपनाम पा जाना कोई खेल नहीं है. पिता उदय नारायण सिंह के मित्र और वरिष्ठ पत्रकार निराला बिदेशिया कहते हैं कि "तीस्ता ईश्वरीय देन थी. इतनी कम उम्र में भी वह बदलाव को महसूस कर रही थी. इसलिए उसने लीक से हटकर लोकगाथा और लोकगीतों के गायन की परंपरा को चुना."
निराला कहते हैं, "इतना समझ लीजिए कि भोजपुरी इस समय कला और संस्कृति के मामले में संकटग्रस्त है. चारों तरफ़ अश्लीलता का भौंडा प्रदर्शन हो रहा है. शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, चंदन तिवारी जैसे उंगली पर गिने जाने भर लोग ही बचे हैं जो भोजपुरी की संस्कृति और कला को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं. तीस्ता उन्हीं में से एक थी.''
इतनी कम उम्र में कहां से मिली तीस्ता को इतनी प्रवीणता! इस सवाल का जवाब यशवंत मिश्रा से बेहतर कौन बना सकता है जो दस दिनों तक पटना एम्स में भर्ती तीस्ता के साथ हर पल मौजूद रहे और पिता उदय नारायण सिंह का हौसला बढ़ाते रहे.
वो कहते हैं, ''उदयनारायण ख़ुद एक मंझे हुए लोकगायक और संगीत के शिक्षक हैं. इस तरह संगीत तो तीस्ता को विरासत में ही मिला था. आप कह सकते हैं कि वो उदय नारायण सिंह की आवाज़ थी. लोकगाथा और लोकगीतों के गायन की सीख उसे पिता से ही मिली है. संगीत पिता का होता था और बोल बेटी के होते थे. दोनों की अद्भुत जुगलबंदी थी.''
पिता उदय नारायण को दो दिन पहले ही मालूम चल गया था कि तीस्ता अब जीवन की आख़िरी सांस ले रही है. डॉक्टरों ने असमर्थता ज़ाहिर कर दी थी. उन्होंने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि पटना एम्स प्रबंधन ने अपनी समर्थता तक हर संभव कोशिशें की. मगर लगातार बुखार रहने के कारण किडनी और लिवर बुरी तरह से प्रभावित हो गए थे.
तीस्ता के असमय इस दुनिया को छोड़ कर चले जाने के मायने उदय नारायण सिंह के लिए बिल्कुल अलग हैं. तीस्ता के गुरु और पिता की संयुक्त भूमिका निभाने वाले उदय नारायण सिंह को दोहरा सदमा लगा है.
बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि वे तीस्ता के साथ लेकर कई प्रोजेक्ट्स में लगे थे. गंगा गाथा से लेकर द्रौपदी और कृष्ण गाथा तक आना बाकी था. अब तीस्ता ही नहीं है तो गाथा कौन गाएगी.
भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में वामपंथ की ओर रुझान रखने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की देश भर से हुई गिरफ़्तारियों के बाद एक अहम सवाल खड़ा हुआ है. सवाल ये है कि इसी मामले में प्रमुख अभियुक्त संभाजी भिडे के ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई है.
पुणे के एसपी (ग्रामीण) संदीप पाटील ने बीबीसी मराठी से बातचीत में कहा कि शिव प्रतिष्ठान के संभाजी भिडे और समस्त हिंदू अघाड़ी के मिलिंद एकबोटे के ख़िलाफ़ अगले 15-20 दिनों में एक चार्जशीट दायर की जाएगी.
पाटील ने कहा, "दोनों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दाख़िल करने की तैयारियां चल रही हैं और अगले 15-20 दिनों में यह काम पूरा हो जाएगा."
1 जनवरी, 2018 में भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के अगले दिन पिंपरी चिंचवाड़ की अनीता सावले ने इस सिलसिले में पिंपरी पुलिस स्टेशन में शिक़ायत दर्ज कराई थी. इस शिक़ायत में संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को अभियुक्त बनाया गया था.
शिक़ायत दर्ज किए जाने के साढ़े तीन महीने बाद 14 मार्च को मिलिंद एकबोटे को गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसके बाद अगले महीने यानी अप्रैल में उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था. वहीं, संभाजी भिडे को इस मामले में अब तक गिरफ़्तार नहीं किया गया है.
एसपी संदीप पाटील कहते हैं, "मैं कुछ दिनों पहले ही यहां का एसपी नियुक्त हुआ हैं. मैं कुछ ज़रूरी कागज़ातों को देख लूं, फिर इस बारे में बात कर पाऊंगा."
इससे पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने मार्च, 2018 में कहा था कि भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में संभाजी भिडे के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है. ये बयान उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा में दिया था.
उन्होंने कहा था, "जिस महिला ने शिक़ायत की अर्ज़ी डाली थी उसने दावा किया था कि उसने संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को भीमा कोरेगांव में दंगों का नेतृत्व करते देखा था. हमने उसी के मुताबिक शिकायत दर्ज की थी. लेकिन जब मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में महिला ने कहा कि न तो वो संभाजी भिडे गुरुजी को जानती हैं और न ही उन्होंने कभी उन्हें देखा है. मजिस्ट्रेट के सामने उन्होंने बस इतना ही कहा कि उन्होंने ऐसा सुना कि संभाजी भिडे दंगे करा रहे हैं. अब तक पुलिस को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जिससे साबित हो कि गुरुजी हिंसा में शामिल थे."
बीबीसी मराठी ने जब शिकायतकर्ता अनीता सावले से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि देवेंद्र फड़णवीस ने उनके बयान की ग़लत तरीके से व्याख्या की है.
उन्होंने कहा, "हो सकता है कि मुख्यमंत्री ने एफ़आईआर ठीक से पढ़ी ही न हो. उन्होंने पूरे मामले को ग़लत तरीके से समझ लिया हो. जहां तक संभाजी भिड़े की बात है तो उन्हें पहले ही गिरफ़्तार कर लिया जाना चाहिए था. अगर उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर है और वो संदिग्ध अभियुक्त हैं तो उन्हें गिरफ़्तार करके अदालत में पेश किया जाना चाहिए."
अनीता ने कहा कि उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में संभाजी भिड़े की गिरफ़्तारी के लिए याचिका भी डाली थी. याचिका जून में दायर की गई थी, लेकिन उस पर सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, "हम पहले दिन से यह सच बताते आए हैं कि यहां जो कुछ भी हुआ उसमें गुरुजी शामिल नहीं थे. जांच एजेंसियां इस पर पिछले आठ महीने से काम कर रही हैं और उन्हें भिड़े गुरुजी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है."
चौगुले ने कहा, "अगर जांच एजेंसियां काम नहीं कर रही हैं तो जो लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं, उन्हें सीधे एसेंजियों को सबूत दे देना चाहिए या इन्हें अदालत में पेश करना चाहिए. अगर वो ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें कम से कम मीडिया के सामने सबूत रखने चाहिए और फिर भिड़े गुरुजी की गिरफ़्तारी की मांग करनी चाहिए. जिन माओवादियों के ख़िलाफ़ इस केस के सिलसिले में सबूत मिले हैं उन्हें जांच एजेंसियों ने गिरफ़्तार किया है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही है.

Thursday, August 16, 2018

वे भाषणों में हंसाते भी थे, भावनाओं में बहाते भी थे

गया ज़िले में बॉयेज़ चिल्ड्रेन होम जिसे 'डीओआरडी' नामक संस्था चला रही थी, उसमें लड़कों को लॉक-अप में रखा जाता था. उनसे महिलाओं के ख़िलाफ़ भद्दे/अश्लील मैसेज लिखाए जाते थे. बच्चों ने वो डंडा भी दिखाया जिससे उनकी पिटाई की जाती थी.
5. कोशिश की टीम ने तीन अडॉप्शन एजेंसियों (बच्चा गोद लेने वाले केंद्र) का भी मुआयना किया जिनमें पटना के 'नारी गुंजन', मधुबनी के 'आरईवीएसके' और कैमूर के 'ज्ञान भारती' शामिल हैं. इन एजेंसियों के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि वो जगह बच्चों के रहने लायक नहीं थी. वहां के बच्चों को गोद लेने की संख्या भी बहुत ही कम थी. हालांकि बच्चे इतने छोटे थे कि उनसे बात नहीं हो सकती थी.
6. अररिया के 'ऑब्जर्वेशन होम' में रहने वाले लड़कों की कहानी सबसे दर्दनाक थी. उस शेल्टर होम का गार्ड लड़कों को सरिये से मारता था. लड़कों को इतनी बुरी तरह मारा गया था कि उनकी हड्डियाँ तक टूट गई थीं. कई लड़कों को तो टूटी हड्डियों के लिए इलाज़ भी मुहैया नहीं करवाया गया. इन लड़कों के भीतर वहां के सुरक्षा गार्ड के लिए इतनी नफ़रत थी कि वो शेल्टर होम से निकलते ही सबसे पहले उसका मर्डर करना चाहते थे. एक लड़के ने कोशिश की टीम से कहा - ''इस जगह का नाम तो सुधार गृह के जगह बिगाड़ गृह कर देना चाहिए.''
7. पटना के शॉर्ट स्टे होम 'इकार्द'(IKARD) में रहने वाली लड़कियों का दुख सबसे अलग था. कुछ लड़कियां इस स्टे होम में सिर्फ इस वजह से पहुंच गई थीं क्योंकि उन्हें अपने घर का रास्ता याद नहीं था. हालांकि उनके पास घर का पता और फ़ोन नंबर दोनों थे लेकिन उन्हें अपने घर में बात करने तक की इजाज़त नहीं थी. इस स्टे होम में भी लड़कियों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार होता था.
यहां एक लड़की ने साल भर पहले भी आत्महत्या की थी. यहां रहने वाली लड़कियों को न तो कपड़े दिए जाते थे, न नहाने-धोने का सामान और न ही दवाइयां दी जाती थीं. कुल मिला कर रिपोर्ट के अनुसार ये रहने लायक जगह नहीं थी. मोतिहारी में सखी के शॉर्ट स्टे होम में तो महिला काउंसिलर ही लड़कियों के साथ शारीरिक हिंसा में शामिल पाई गईं. वह स्टे होम किसी मंदिर की तरह दिखता था. वहां रहने वाली मुस्लिम महिला को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त नहीं थी. उसकी क़ुरान तक को फाड़ दिया गया. वहां लड़कियों को सेनेटरी पैड भी नहीं दिए जाते थे.
9. मुंगेर के शॉर्ट स्टे होम को 'नोवेल्टी वेलफ़ेयर सोसाइटी' चलाती थी, यहां लड़कियों के बाथरूम में दरवाजा लॉक तक नहीं होता था. सोने के लिए पलंग पर गद्दे तक नहीं थे. इस स्टे होम का एक हिस्सा दस हज़ार रु किराए पर किसी दूसरे परिवार को रहने के लिए दे दिया गया था.
10. मधेपुरा और कैमूर के शॉर्ट स्टे होम में महिलाओं की हालत बाकी शेल्टर होम जैसी ही दिखी. कैमूर में तो सुरक्षा गार्ड तक महिलाओं के प्राइवेट पार्ट छूने की कोशिश करता था, उन पर भद्दे कमेंट करता था.
11. सेवा कुटीर मुज़फ़्फ़रपुर जिसे ओम साईं फाउंडेशन चला रही थी, वहां भी रहने वालों के साथ शारीरिक और यौन हिंसा की शिकायतें कोशिश की टीम को मिली. यहां केयर टेकर उन्हें मारता-पीटता भी था. कमरों में न तो पंखा ना और ना ही रोशनी के लिए बत्ती. इतना ही नहीं पीने के लिए साफ पानी तक नहीं था. कइयों को यहां काम देने का झांसा देकर लाया गया था.
12. पटना में कुशल कुटीर और गया में सेवा कुटीर में भी रहने वालों ने मिलती-जुलती दास्तान सुनाई.
लेकिन ऐसा नहीं है कि इस रिपोर्ट में केवल सरकार की आलोचना ही की गई हैदरभंगा के आब्ज़र्वेशन होम उन आठ अच्छे शेल्टर होम में से एक है जिसका ज़िक्र TISS की रिपोर्ट में किया गया.
दरभंगा के अलावा बक्सर, सारन, कटिहार, भागलपुर, पूर्णिया और नालंदा के शेल्टर होम की भी तारीफ की गई है.
जहां एक शेल्टर होम में रहने वालों से बागवानी कराई जाती थी, तो दूसरे शेल्टर होम में कर्मचारी वहां के बच्चों की पढ़ाई में मदद करते थे. इन सुधार गृहों में रहने वालों के चेहरे पर मुस्कान देखने को मिली.
सारन के अडॉप्शन सेंटर को तो TISS की टीम 'मॉडल अडॉप्शन सेंटर' तक कहा है. भागलपुर में बच्चियों के लिए चलाए जाने वाले चिल्ड्रेन होम में वहां काम करने वाले कर्मचारी अपने बच्चों का जन्मदिन सुधार गृह में मनाते थे. पूर्णिया के शेल्टर होम में बाहर से वॉलिंटियर आते थे और वहां रहने वालों को काम सिखाते थे.
दिलचस्प बात यह है कि इस रिपोर्ट के लिए TISS का चयन खुद बिहार सरकार ने ही किया था. रिपोर्ट में इस बात का भी साफ़ तौर पर ज़िक्र किया गया है कि इस पूरे ऑडिट के लिए TISS की टीम ने किसी तरह का कोई पैसा नहीं लिया है.

Monday, August 13, 2018

किसी की 'बुरी नज़र' में कितनी ताक़त होती है

'बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला…' ये जुमला आपने अक्सर ऑटो, रिक्शा, ट्रक या किसी अन्य वाहन के पीछे लिखा देखा होगा.
मन में कई बार सवाल भी उठा होगा कि नज़र बुरी या अच्छी कैसे हो सकती है. लेकिन दुनिया भर में इसे लेकर पुख्ता यक़ीन है.
भारत में तो बुरी नज़र के प्रकोप से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं. कोई गाड़ी पर उल्टी चप्पलें लटकाता है, तो कोई नींबू-हरी मिर्च लटकाता है.
वहीं कोई बुरी नज़र का असर ख़त्म करने के लिए लाल मिर्चें जला डालता है. इस तरह के उपायों की लिस्ट काफ़ी लंबी है.
बुरी नज़र का असर ख़त्म करने वाली आँख ने गुज़रे एक दशक में फ़ैशन वर्ल्ड में भी अपनी धाक जमाई है.
अमरीकी रिएलिटी टेलीविज़न की मशहूर हस्ती किम कर्डाशियां को कई मौक़ों पर नीली आँख वाले मोतियों की ब्रेसलेट और माला के साथ फ़ोटो खिंचाते देखा गया है.
फ़ैशन मॉडल गिगी हेडिड ने भी लोगों के बीच बढ़ते इस क्रेज़ को भुनाने के लिए साल 2017 में एलान किया कि वो बहुत जल्द आई-लव जूतों की रेंज मार्केट में उतारने वाली हैं.
जब बड़ी सेलेब्रिटिज़ ने प्रचार करना शुरू किया, तो बुरी नज़र से बचाने वाले मोतियों के इस्तेमाल से ब्रेसलेट और हार बनाने के लिए ऑनलाइन ट्यूटोरियल भी शुरू हो गए.
बहरहाल, ये बात तो हुई लोगों के यक़ीन का कमर्शियल फ़ायदा उठाने की. लेकिन सच यही है कि इवल आई यानी शैतानी आँख ने इंसान की कल्पना शक्ति पर सदियों से अपना क़ब्ज़ा जमा रखा है.
शैतान की आँख का तसव्वुर कब, कहाँ और कैसे शुरू हुआ जानने से पहले तावीज़ और शैतान की आँख का फ़र्क़ समझना होगा.
तावीज़ हर बुरी चीज़ से बचाव के लिए हज़ारों वर्षों से पहना जा रहा है. वक़्त के साथ इसके इस्तेमाल में बहुत से बदलाव आए, लेकिन इसका इस्तेमाल कब और कहाँ शुरू हुआ, पुख्ता तौर पर पता लगाना मुश्किल है.
जबकि शैतानी आँख वाले तावीज़ का इस्तेमाल बुरी नज़र रखने वालों का बुरा करने के लिए पहना जाता है.
माना जाता है जिस इंसान को भरपूर सफलता मिल जाती है, उसके दुश्मन भी ख़ूब पैदा हो जाते हैं. लेकिन शैतानी आँख ऐसे लोगों को उनके मक़सद में कामयाब होने नहीं देती.
प्राचीन ग्रीस रोमेंस एथियोपिका में हेलियोडोरस ऑफ़ इमिसा ने लिखा है कि जब किसी अच्छी चीज़ को कोई बुरी नज़र से देखता है, तो आस-पास के माहौल को घातक वाइब्स से भर देता है.
फ़्रेडरिक थॉमस एलवर्थी का दा ईविल आई- द क्लासिकल अकाउंट ऑफ़ एन एनशियंट सुपरस्टीशन को ईविल-आई या शैतानी आँख से संबंधित क़िस्से कहानियों का सबसे अच्छा संग्रह माना गया है.
इस किताब में बहुत-सी संस्कृतियों में प्रचलित अंधविश्वास और उनसे जुड़ी निशानियों का ज़िक्र है.
इस किताब में आपको ग्रीक चुड़ैल के घूरने की कहानी से लेकर वो लोक कथाएं भी मिल जाएंगी जिनमें भूत-प्रेत के देखने भर से इंसान को घोड़ा और उसे पत्थर का बना देने तक का ज़िक्र मिलता है.
दिलचस्प बात है कि आँख के निशान का संबंध बुतपरस्ती वाले मज़हबों से है, लेकिन आसमानी या इब्राहिमी मज़हबों की किताबों जैसे क़ुरान और बाइबिल में भी इसका ज़िक्र मिलता है.
बुरी नज़र, शैतानी आँख, तावीज़ वग़ैरह का संबंध सीधे तौर पर अंधविश्वास से है. लेकिन कुछ दार्शनिक इसका संबंध विज्ञान से जोड़कर देखते हैं.
इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम ग्रीक दार्शनिक प्लूटार्क का है. वो इसका वैज्ञानिक पहलू बताते हुए लिखते हैं कि इंसानी आँख में से ऊर्जा की किरणें निकलती हैं जो नज़र नहीं आतीं.
इन किरणों में किसी भी छोटे जानवर या बच्चे को मार देने की ताक़त होती है. एक क़दम और आगे बढ़ते हुए वो कहते हैं, कि कुछ लोगों में तो सामने वाले को अपना मुरीद बना लेने तक की ताक़त होती है.
सबसे ज़्यादा किसी का नुक़सान करने की क्षमता नीली आंखों से निकलने वाली किरणों में होती है. लगभग सभी संस्कृतियों की लोक कहानियों में बुरी नज़र से विनाश होने का ज़िक्र आम है.
लेकिन कुछ संस्कृतियों में बुरी नज़र रखना ही ख़राब माना गया है. वो इसे अभिशाप मानते हैं.
मिसाल के लिए दार्शनिक एनवर्थी पोलैंड की एक लोक कथा का हवाला देते हुए कहते हैं कि एक आदमी की नज़र में दूसरों का बुरा करने वाली किरणें बहुत ज़्यादा थीं.
जब उसे इसका अंदाज़ा हुआ तो उसने अपने अज़ीज़ों के भले के लिए अपनी एक आँख ही निकलवा दी.
तुर्की की इस्तांबुल यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर डॉक्टर नेस येल्दरिन का कहना है कि आँख वाले तावीज़ का सबसे पहला नमूना 3300 ई.पू में मिलता है.
मेसोपोटामिया के सबसे पुराने शहर तल बराक में खुदाई के वक़्त कुछ तावीज़ मिले थे. ये तावीज़ संगमरमर की मूर्तियों के शक्ल के थे, जिन पर जगह-जगह कुरेद कर आँख उकेरी गई थी.
जहाँ तक नीली आँख का ताल्लुक़ है तो ये मिस्र की चमकीली मिट्टी से आयी है, जिसमें ऑक्साइड की मात्रा ज़्यादा होती है. तांबे और कोबाल्ट के साथ जब इसे पकाया जाता है तो नीला रंग आ जाता है.
येल्दरिन आज के दौर में नज़र लगने की मान्यता को प्राचीन मिस्र से जोड़कर देखते हैं. खुदाई में यहां होरोस की आँख वाले बहुत से पेंडेंट मिले हैं.
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार होरोस मिस्री लोगों का आसमानी देवता था. उसकी दाईं आँख का संबंध सूरज से था. लोग उसे शुभ मानते थे और बुरी नज़र से बचाव के लिए अपने साथ रखते थे.
तुर्की के पूर्व जनजाति के लोग भी नीले रंग से खासा लगाव रखते थे. इस रंग का संबंध उनके आसमानी देवता से था.
नीली आँख वाले मोती फ़ोनेशियन, असीरियन, ग्रीक, रोमन और सबसे ज़्यादा ऑटोमन साम्राज्य में इस्तेमाल हुए.
भूमध्य सागर के आस-पास के द्वीपों में इन्हें कारोबार के लिहाज़ से लाया गया था. लेकिन यहां से ये दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी फैल गए.
मिस्री लोग आज भी अपने जहाज़ों पर हिफ़ाज़त के लिए ईविल-आई बनवाते हैं. तुर्की में आज भी बच्चे की पैदाइश पर बुरी नज़र से बचाने के लिए शैतानी आँख वाला तावीज़ पहनाया जाता है.
बहरहाल इसे लेकर मान्यताएं चाहें जो भी रही हों, पर सच यही है कि इसने दुनिया की तमाम सभ्यताओं पर असर डाला है. और अब तो शैतानी आँख ने फ़ैशन की दुनिया में भी सिक्का जमा लिया है.
लेकिन यहां गौर करने वाली बात है कि किम कर्डाशियां हों या गिगी हेडिड, दोनों सेलेब्रिटी ऐसी जगह से ताल्लुक़ रखती हैं, जहाँ ईविल-आई को लेकर पुख्ता यक़ीन है.