गया ज़िले में बॉयेज़ चिल्ड्रेन होम जिसे 'डीओआरडी' नामक संस्था चला
रही थी, उसमें लड़कों को लॉक-अप में रखा जाता था. उनसे महिलाओं के ख़िलाफ़
भद्दे/अश्लील मैसेज लिखाए जाते थे. बच्चों ने वो डंडा भी दिखाया जिससे उनकी
पिटाई की जाती थी.
5. कोशिश की टीम ने तीन अडॉप्शन एजेंसियों (बच्चा गोद लेने वाले केंद्र) का भी मुआयना किया जिनमें पटना के 'नारी गुंजन', मधुबनी के 'आरईवीएसके' और कैमूर के 'ज्ञान भारती' शामिल हैं. इन एजेंसियों के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि वो जगह बच्चों के रहने लायक नहीं थी. वहां के बच्चों को गोद लेने की संख्या भी बहुत ही कम थी. हालांकि बच्चे इतने छोटे थे कि उनसे बात नहीं हो सकती थी.
6. अररिया के 'ऑब्जर्वेशन होम' में रहने वाले लड़कों की कहानी सबसे दर्दनाक थी. उस शेल्टर होम का गार्ड लड़कों को सरिये से मारता था. लड़कों को इतनी बुरी तरह मारा गया था कि उनकी हड्डियाँ तक टूट गई थीं. कई लड़कों को तो टूटी हड्डियों के लिए इलाज़ भी मुहैया नहीं करवाया गया. इन लड़कों के भीतर वहां के सुरक्षा गार्ड के लिए इतनी नफ़रत थी कि वो शेल्टर होम से निकलते ही सबसे पहले उसका मर्डर करना चाहते थे. एक लड़के ने कोशिश की टीम से कहा - ''इस जगह का नाम तो सुधार गृह के जगह बिगाड़ गृह कर देना चाहिए.''
7. पटना के शॉर्ट स्टे होम 'इकार्द'(IKARD) में रहने वाली लड़कियों का दुख सबसे अलग था. कुछ लड़कियां इस स्टे होम में सिर्फ इस वजह से पहुंच गई थीं क्योंकि उन्हें अपने घर का रास्ता याद नहीं था. हालांकि उनके पास घर का पता और फ़ोन नंबर दोनों थे लेकिन उन्हें अपने घर में बात करने तक की इजाज़त नहीं थी. इस स्टे होम में भी लड़कियों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार होता था.
यहां एक लड़की ने साल भर पहले भी आत्महत्या की थी. यहां रहने वाली लड़कियों को न तो कपड़े दिए जाते थे, न नहाने-धोने का सामान और न ही दवाइयां दी जाती थीं. कुल मिला कर रिपोर्ट के अनुसार ये रहने लायक जगह नहीं थी. मोतिहारी में सखी के शॉर्ट स्टे होम में तो महिला काउंसिलर ही लड़कियों के साथ शारीरिक हिंसा में शामिल पाई गईं. वह स्टे होम किसी मंदिर की तरह दिखता था. वहां रहने वाली मुस्लिम महिला को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त नहीं थी. उसकी क़ुरान तक को फाड़ दिया गया. वहां लड़कियों को सेनेटरी पैड भी नहीं दिए जाते थे.
9. मुंगेर के शॉर्ट स्टे होम को 'नोवेल्टी वेलफ़ेयर सोसाइटी' चलाती थी, यहां लड़कियों के बाथरूम में दरवाजा लॉक तक नहीं होता था. सोने के लिए पलंग पर गद्दे तक नहीं थे. इस स्टे होम का एक हिस्सा दस हज़ार रु किराए पर किसी दूसरे परिवार को रहने के लिए दे दिया गया था.
10. मधेपुरा और कैमूर के शॉर्ट स्टे होम में महिलाओं की हालत बाकी शेल्टर होम जैसी ही दिखी. कैमूर में तो सुरक्षा गार्ड तक महिलाओं के प्राइवेट पार्ट छूने की कोशिश करता था, उन पर भद्दे कमेंट करता था.
11. सेवा कुटीर मुज़फ़्फ़रपुर जिसे ओम साईं फाउंडेशन चला रही थी, वहां भी रहने वालों के साथ शारीरिक और यौन हिंसा की शिकायतें कोशिश की टीम को मिली. यहां केयर टेकर उन्हें मारता-पीटता भी था. कमरों में न तो पंखा ना और ना ही रोशनी के लिए बत्ती. इतना ही नहीं पीने के लिए साफ पानी तक नहीं था. कइयों को यहां काम देने का झांसा देकर लाया गया था.
12. पटना में कुशल कुटीर और गया में सेवा कुटीर में भी रहने वालों ने मिलती-जुलती दास्तान सुनाई.
लेकिन ऐसा नहीं है कि इस रिपोर्ट में केवल सरकार की आलोचना ही की गई हैदरभंगा के आब्ज़र्वेशन होम उन आठ अच्छे शेल्टर होम में से एक है जिसका ज़िक्र TISS की रिपोर्ट में किया गया.
दरभंगा के अलावा बक्सर, सारन, कटिहार, भागलपुर, पूर्णिया और नालंदा के शेल्टर होम की भी तारीफ की गई है.
जहां एक शेल्टर होम में रहने वालों से बागवानी कराई जाती थी, तो दूसरे शेल्टर होम में कर्मचारी वहां के बच्चों की पढ़ाई में मदद करते थे. इन सुधार गृहों में रहने वालों के चेहरे पर मुस्कान देखने को मिली.
सारन के अडॉप्शन सेंटर को तो TISS की टीम 'मॉडल अडॉप्शन सेंटर' तक कहा है. भागलपुर में बच्चियों के लिए चलाए जाने वाले चिल्ड्रेन होम में वहां काम करने वाले कर्मचारी अपने बच्चों का जन्मदिन सुधार गृह में मनाते थे. पूर्णिया के शेल्टर होम में बाहर से वॉलिंटियर आते थे और वहां रहने वालों को काम सिखाते थे.
दिलचस्प बात यह है कि इस रिपोर्ट के लिए TISS का चयन खुद बिहार सरकार ने ही किया था. रिपोर्ट में इस बात का भी साफ़ तौर पर ज़िक्र किया गया है कि इस पूरे ऑडिट के लिए TISS की टीम ने किसी तरह का कोई पैसा नहीं लिया है.
5. कोशिश की टीम ने तीन अडॉप्शन एजेंसियों (बच्चा गोद लेने वाले केंद्र) का भी मुआयना किया जिनमें पटना के 'नारी गुंजन', मधुबनी के 'आरईवीएसके' और कैमूर के 'ज्ञान भारती' शामिल हैं. इन एजेंसियों के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि वो जगह बच्चों के रहने लायक नहीं थी. वहां के बच्चों को गोद लेने की संख्या भी बहुत ही कम थी. हालांकि बच्चे इतने छोटे थे कि उनसे बात नहीं हो सकती थी.
6. अररिया के 'ऑब्जर्वेशन होम' में रहने वाले लड़कों की कहानी सबसे दर्दनाक थी. उस शेल्टर होम का गार्ड लड़कों को सरिये से मारता था. लड़कों को इतनी बुरी तरह मारा गया था कि उनकी हड्डियाँ तक टूट गई थीं. कई लड़कों को तो टूटी हड्डियों के लिए इलाज़ भी मुहैया नहीं करवाया गया. इन लड़कों के भीतर वहां के सुरक्षा गार्ड के लिए इतनी नफ़रत थी कि वो शेल्टर होम से निकलते ही सबसे पहले उसका मर्डर करना चाहते थे. एक लड़के ने कोशिश की टीम से कहा - ''इस जगह का नाम तो सुधार गृह के जगह बिगाड़ गृह कर देना चाहिए.''
7. पटना के शॉर्ट स्टे होम 'इकार्द'(IKARD) में रहने वाली लड़कियों का दुख सबसे अलग था. कुछ लड़कियां इस स्टे होम में सिर्फ इस वजह से पहुंच गई थीं क्योंकि उन्हें अपने घर का रास्ता याद नहीं था. हालांकि उनके पास घर का पता और फ़ोन नंबर दोनों थे लेकिन उन्हें अपने घर में बात करने तक की इजाज़त नहीं थी. इस स्टे होम में भी लड़कियों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार होता था.
यहां एक लड़की ने साल भर पहले भी आत्महत्या की थी. यहां रहने वाली लड़कियों को न तो कपड़े दिए जाते थे, न नहाने-धोने का सामान और न ही दवाइयां दी जाती थीं. कुल मिला कर रिपोर्ट के अनुसार ये रहने लायक जगह नहीं थी. मोतिहारी में सखी के शॉर्ट स्टे होम में तो महिला काउंसिलर ही लड़कियों के साथ शारीरिक हिंसा में शामिल पाई गईं. वह स्टे होम किसी मंदिर की तरह दिखता था. वहां रहने वाली मुस्लिम महिला को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त नहीं थी. उसकी क़ुरान तक को फाड़ दिया गया. वहां लड़कियों को सेनेटरी पैड भी नहीं दिए जाते थे.
9. मुंगेर के शॉर्ट स्टे होम को 'नोवेल्टी वेलफ़ेयर सोसाइटी' चलाती थी, यहां लड़कियों के बाथरूम में दरवाजा लॉक तक नहीं होता था. सोने के लिए पलंग पर गद्दे तक नहीं थे. इस स्टे होम का एक हिस्सा दस हज़ार रु किराए पर किसी दूसरे परिवार को रहने के लिए दे दिया गया था.
10. मधेपुरा और कैमूर के शॉर्ट स्टे होम में महिलाओं की हालत बाकी शेल्टर होम जैसी ही दिखी. कैमूर में तो सुरक्षा गार्ड तक महिलाओं के प्राइवेट पार्ट छूने की कोशिश करता था, उन पर भद्दे कमेंट करता था.
11. सेवा कुटीर मुज़फ़्फ़रपुर जिसे ओम साईं फाउंडेशन चला रही थी, वहां भी रहने वालों के साथ शारीरिक और यौन हिंसा की शिकायतें कोशिश की टीम को मिली. यहां केयर टेकर उन्हें मारता-पीटता भी था. कमरों में न तो पंखा ना और ना ही रोशनी के लिए बत्ती. इतना ही नहीं पीने के लिए साफ पानी तक नहीं था. कइयों को यहां काम देने का झांसा देकर लाया गया था.
12. पटना में कुशल कुटीर और गया में सेवा कुटीर में भी रहने वालों ने मिलती-जुलती दास्तान सुनाई.
लेकिन ऐसा नहीं है कि इस रिपोर्ट में केवल सरकार की आलोचना ही की गई हैदरभंगा के आब्ज़र्वेशन होम उन आठ अच्छे शेल्टर होम में से एक है जिसका ज़िक्र TISS की रिपोर्ट में किया गया.
दरभंगा के अलावा बक्सर, सारन, कटिहार, भागलपुर, पूर्णिया और नालंदा के शेल्टर होम की भी तारीफ की गई है.
जहां एक शेल्टर होम में रहने वालों से बागवानी कराई जाती थी, तो दूसरे शेल्टर होम में कर्मचारी वहां के बच्चों की पढ़ाई में मदद करते थे. इन सुधार गृहों में रहने वालों के चेहरे पर मुस्कान देखने को मिली.
सारन के अडॉप्शन सेंटर को तो TISS की टीम 'मॉडल अडॉप्शन सेंटर' तक कहा है. भागलपुर में बच्चियों के लिए चलाए जाने वाले चिल्ड्रेन होम में वहां काम करने वाले कर्मचारी अपने बच्चों का जन्मदिन सुधार गृह में मनाते थे. पूर्णिया के शेल्टर होम में बाहर से वॉलिंटियर आते थे और वहां रहने वालों को काम सिखाते थे.
दिलचस्प बात यह है कि इस रिपोर्ट के लिए TISS का चयन खुद बिहार सरकार ने ही किया था. रिपोर्ट में इस बात का भी साफ़ तौर पर ज़िक्र किया गया है कि इस पूरे ऑडिट के लिए TISS की टीम ने किसी तरह का कोई पैसा नहीं लिया है.
No comments:
Post a Comment