महज 17 साल की उम्र में किसी भी लोकगायिका के लिए "बिहार की तीजनबाई"
जैसा उपनाम पा जाना कोई खेल नहीं है. पिता उदय नारायण सिंह के मित्र और
वरिष्ठ पत्रकार निराला बिदेशिया कहते हैं कि "तीस्ता ईश्वरीय देन थी. इतनी
कम उम्र में भी वह बदलाव को महसूस कर रही थी. इसलिए उसने लीक से हटकर
लोकगाथा और लोकगीतों के गायन की परंपरा को चुना."
निराला कहते हैं, "इतना समझ लीजिए कि भोजपुरी इस समय कला और संस्कृति के मामले में संकटग्रस्त है. चारों तरफ़ अश्लीलता का भौंडा प्रदर्शन हो रहा है. शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, चंदन तिवारी जैसे उंगली पर गिने जाने भर लोग ही बचे हैं जो भोजपुरी की संस्कृति और कला को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं. तीस्ता उन्हीं में से एक थी.''
इतनी कम उम्र में कहां से मिली तीस्ता को इतनी प्रवीणता! इस सवाल का जवाब यशवंत मिश्रा से बेहतर कौन बना सकता है जो दस दिनों तक पटना एम्स में भर्ती तीस्ता के साथ हर पल मौजूद रहे और पिता उदय नारायण सिंह का हौसला बढ़ाते रहे.
वो कहते हैं, ''उदयनारायण ख़ुद एक मंझे हुए लोकगायक और संगीत के शिक्षक हैं. इस तरह संगीत तो तीस्ता को विरासत में ही मिला था. आप कह सकते हैं कि वो उदय नारायण सिंह की आवाज़ थी. लोकगाथा और लोकगीतों के गायन की सीख उसे पिता से ही मिली है. संगीत पिता का होता था और बोल बेटी के होते थे. दोनों की अद्भुत जुगलबंदी थी.''
पिता उदय नारायण को दो दिन पहले ही मालूम चल गया था कि तीस्ता अब जीवन की आख़िरी सांस ले रही है. डॉक्टरों ने असमर्थता ज़ाहिर कर दी थी. उन्होंने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि पटना एम्स प्रबंधन ने अपनी समर्थता तक हर संभव कोशिशें की. मगर लगातार बुखार रहने के कारण किडनी और लिवर बुरी तरह से प्रभावित हो गए थे.
तीस्ता के असमय इस दुनिया को छोड़ कर चले जाने के मायने उदय नारायण सिंह के लिए बिल्कुल अलग हैं. तीस्ता के गुरु और पिता की संयुक्त भूमिका निभाने वाले उदय नारायण सिंह को दोहरा सदमा लगा है.
बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि वे तीस्ता के साथ लेकर कई प्रोजेक्ट्स में लगे थे. गंगा गाथा से लेकर द्रौपदी और कृष्ण गाथा तक आना बाकी था. अब तीस्ता ही नहीं है तो गाथा कौन गाएगी.
पाटील ने कहा, "दोनों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दाख़िल करने की तैयारियां चल रही हैं और अगले 15-20 दिनों में यह काम पूरा हो जाएगा."
1 जनवरी, 2018 में भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के अगले दिन पिंपरी चिंचवाड़ की अनीता सावले ने इस सिलसिले में पिंपरी पुलिस स्टेशन में शिक़ायत दर्ज कराई थी. इस शिक़ायत में संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को अभियुक्त बनाया गया था.
शिक़ायत दर्ज किए जाने के साढ़े तीन महीने बाद 14 मार्च को मिलिंद एकबोटे को गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसके बाद अगले महीने यानी अप्रैल में उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था. वहीं, संभाजी भिडे को इस मामले में अब तक गिरफ़्तार नहीं किया गया है.
एसपी संदीप पाटील कहते हैं, "मैं कुछ दिनों पहले ही यहां का एसपी नियुक्त हुआ हैं. मैं कुछ ज़रूरी कागज़ातों को देख लूं, फिर इस बारे में बात कर पाऊंगा."
इससे पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने मार्च, 2018 में कहा था कि भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में संभाजी भिडे के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है. ये बयान उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा में दिया था.
उन्होंने कहा था, "जिस महिला ने शिक़ायत की अर्ज़ी डाली थी उसने दावा किया था कि उसने संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को भीमा कोरेगांव में दंगों का नेतृत्व करते देखा था. हमने उसी के मुताबिक शिकायत दर्ज की थी. लेकिन जब मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में महिला ने कहा कि न तो वो संभाजी भिडे गुरुजी को जानती हैं और न ही उन्होंने कभी उन्हें देखा है. मजिस्ट्रेट के सामने उन्होंने बस इतना ही कहा कि उन्होंने ऐसा सुना कि संभाजी भिडे दंगे करा रहे हैं. अब तक पुलिस को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जिससे साबित हो कि गुरुजी हिंसा में शामिल थे."
बीबीसी मराठी ने जब शिकायतकर्ता अनीता सावले से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि देवेंद्र फड़णवीस ने उनके बयान की ग़लत तरीके से व्याख्या की है.
उन्होंने कहा, "हो सकता है कि मुख्यमंत्री ने एफ़आईआर ठीक से पढ़ी ही न हो. उन्होंने पूरे मामले को ग़लत तरीके से समझ लिया हो. जहां तक संभाजी भिड़े की बात है तो उन्हें पहले ही गिरफ़्तार कर लिया जाना चाहिए था. अगर उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर है और वो संदिग्ध अभियुक्त हैं तो उन्हें गिरफ़्तार करके अदालत में पेश किया जाना चाहिए."
अनीता ने कहा कि उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में संभाजी भिड़े की गिरफ़्तारी के लिए याचिका भी डाली थी. याचिका जून में दायर की गई थी, लेकिन उस पर सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, "हम पहले दिन से यह सच बताते आए हैं कि यहां जो कुछ भी हुआ उसमें गुरुजी शामिल नहीं थे. जांच एजेंसियां इस पर पिछले आठ महीने से काम कर रही हैं और उन्हें भिड़े गुरुजी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है."
चौगुले ने कहा, "अगर जांच एजेंसियां काम नहीं कर रही हैं तो जो लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं, उन्हें सीधे एसेंजियों को सबूत दे देना चाहिए या इन्हें अदालत में पेश करना चाहिए. अगर वो ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें कम से कम मीडिया के सामने सबूत रखने चाहिए और फिर भिड़े गुरुजी की गिरफ़्तारी की मांग करनी चाहिए. जिन माओवादियों के ख़िलाफ़ इस केस के सिलसिले में सबूत मिले हैं उन्हें जांच एजेंसियों ने गिरफ़्तार किया है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही है.
निराला कहते हैं, "इतना समझ लीजिए कि भोजपुरी इस समय कला और संस्कृति के मामले में संकटग्रस्त है. चारों तरफ़ अश्लीलता का भौंडा प्रदर्शन हो रहा है. शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, चंदन तिवारी जैसे उंगली पर गिने जाने भर लोग ही बचे हैं जो भोजपुरी की संस्कृति और कला को स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं. तीस्ता उन्हीं में से एक थी.''
इतनी कम उम्र में कहां से मिली तीस्ता को इतनी प्रवीणता! इस सवाल का जवाब यशवंत मिश्रा से बेहतर कौन बना सकता है जो दस दिनों तक पटना एम्स में भर्ती तीस्ता के साथ हर पल मौजूद रहे और पिता उदय नारायण सिंह का हौसला बढ़ाते रहे.
वो कहते हैं, ''उदयनारायण ख़ुद एक मंझे हुए लोकगायक और संगीत के शिक्षक हैं. इस तरह संगीत तो तीस्ता को विरासत में ही मिला था. आप कह सकते हैं कि वो उदय नारायण सिंह की आवाज़ थी. लोकगाथा और लोकगीतों के गायन की सीख उसे पिता से ही मिली है. संगीत पिता का होता था और बोल बेटी के होते थे. दोनों की अद्भुत जुगलबंदी थी.''
पिता उदय नारायण को दो दिन पहले ही मालूम चल गया था कि तीस्ता अब जीवन की आख़िरी सांस ले रही है. डॉक्टरों ने असमर्थता ज़ाहिर कर दी थी. उन्होंने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि पटना एम्स प्रबंधन ने अपनी समर्थता तक हर संभव कोशिशें की. मगर लगातार बुखार रहने के कारण किडनी और लिवर बुरी तरह से प्रभावित हो गए थे.
तीस्ता के असमय इस दुनिया को छोड़ कर चले जाने के मायने उदय नारायण सिंह के लिए बिल्कुल अलग हैं. तीस्ता के गुरु और पिता की संयुक्त भूमिका निभाने वाले उदय नारायण सिंह को दोहरा सदमा लगा है.
बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि वे तीस्ता के साथ लेकर कई प्रोजेक्ट्स में लगे थे. गंगा गाथा से लेकर द्रौपदी और कृष्ण गाथा तक आना बाकी था. अब तीस्ता ही नहीं है तो गाथा कौन गाएगी.
भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में
वामपंथ की ओर रुझान रखने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की देश भर से हुई
गिरफ़्तारियों के बाद एक अहम सवाल खड़ा हुआ है. सवाल ये है कि इसी मामले
में प्रमुख अभियुक्त संभाजी भिडे के ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं
हुई है.
पुणे के एसपी (ग्रामीण) संदीप पाटील ने बीबीसी मराठी से
बातचीत में कहा कि शिव प्रतिष्ठान के संभाजी भिडे और समस्त हिंदू अघाड़ी के
मिलिंद एकबोटे के ख़िलाफ़ अगले 15-20 दिनों में एक चार्जशीट दायर की
जाएगी. पाटील ने कहा, "दोनों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दाख़िल करने की तैयारियां चल रही हैं और अगले 15-20 दिनों में यह काम पूरा हो जाएगा."
1 जनवरी, 2018 में भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के अगले दिन पिंपरी चिंचवाड़ की अनीता सावले ने इस सिलसिले में पिंपरी पुलिस स्टेशन में शिक़ायत दर्ज कराई थी. इस शिक़ायत में संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को अभियुक्त बनाया गया था.
शिक़ायत दर्ज किए जाने के साढ़े तीन महीने बाद 14 मार्च को मिलिंद एकबोटे को गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसके बाद अगले महीने यानी अप्रैल में उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था. वहीं, संभाजी भिडे को इस मामले में अब तक गिरफ़्तार नहीं किया गया है.
एसपी संदीप पाटील कहते हैं, "मैं कुछ दिनों पहले ही यहां का एसपी नियुक्त हुआ हैं. मैं कुछ ज़रूरी कागज़ातों को देख लूं, फिर इस बारे में बात कर पाऊंगा."
इससे पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने मार्च, 2018 में कहा था कि भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में संभाजी भिडे के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है. ये बयान उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा में दिया था.
उन्होंने कहा था, "जिस महिला ने शिक़ायत की अर्ज़ी डाली थी उसने दावा किया था कि उसने संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को भीमा कोरेगांव में दंगों का नेतृत्व करते देखा था. हमने उसी के मुताबिक शिकायत दर्ज की थी. लेकिन जब मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में महिला ने कहा कि न तो वो संभाजी भिडे गुरुजी को जानती हैं और न ही उन्होंने कभी उन्हें देखा है. मजिस्ट्रेट के सामने उन्होंने बस इतना ही कहा कि उन्होंने ऐसा सुना कि संभाजी भिडे दंगे करा रहे हैं. अब तक पुलिस को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जिससे साबित हो कि गुरुजी हिंसा में शामिल थे."
बीबीसी मराठी ने जब शिकायतकर्ता अनीता सावले से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि देवेंद्र फड़णवीस ने उनके बयान की ग़लत तरीके से व्याख्या की है.
उन्होंने कहा, "हो सकता है कि मुख्यमंत्री ने एफ़आईआर ठीक से पढ़ी ही न हो. उन्होंने पूरे मामले को ग़लत तरीके से समझ लिया हो. जहां तक संभाजी भिड़े की बात है तो उन्हें पहले ही गिरफ़्तार कर लिया जाना चाहिए था. अगर उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर है और वो संदिग्ध अभियुक्त हैं तो उन्हें गिरफ़्तार करके अदालत में पेश किया जाना चाहिए."
अनीता ने कहा कि उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में संभाजी भिड़े की गिरफ़्तारी के लिए याचिका भी डाली थी. याचिका जून में दायर की गई थी, लेकिन उस पर सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, "हम पहले दिन से यह सच बताते आए हैं कि यहां जो कुछ भी हुआ उसमें गुरुजी शामिल नहीं थे. जांच एजेंसियां इस पर पिछले आठ महीने से काम कर रही हैं और उन्हें भिड़े गुरुजी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है."
चौगुले ने कहा, "अगर जांच एजेंसियां काम नहीं कर रही हैं तो जो लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं, उन्हें सीधे एसेंजियों को सबूत दे देना चाहिए या इन्हें अदालत में पेश करना चाहिए. अगर वो ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें कम से कम मीडिया के सामने सबूत रखने चाहिए और फिर भिड़े गुरुजी की गिरफ़्तारी की मांग करनी चाहिए. जिन माओवादियों के ख़िलाफ़ इस केस के सिलसिले में सबूत मिले हैं उन्हें जांच एजेंसियों ने गिरफ़्तार किया है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही है.
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