Tuesday, May 14, 2019

भारत-इसराइल मित्र तो ईरान कहां?

इसराइल और ईरान की दुश्मनी भी किसी से छिपी नहीं है. ईरान में 1979 की क्रांति के बाद इसराइल से दुश्मनी और बढ़ी. इतने सालों बाद भी इसराइल और ईरान की दुश्मनी कम नहीं हुई है बल्कि और बढ़ी ही है.
दूसरी तरफ़ इसराइल और भारत क़रीब आते गए. भारत हार्डवेयर और सैन्य तकनीक के मामले में इसराइल पर निर्भर है. ऐसे में ईरान के साथ भारत के रिश्ते उस स्तर तक सामान्य नहीं हो पाए. 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान गए थे. मोदी के दौरे को चाबाहार पोर्ट से जोड़ा गया. भारत के लिए यह पोर्ट चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती की काट के रूप में देखा जा रहा है.

संकट की स्थिति में ईरान की उम्मीद चीन और भारत

संकट की घड़ी में ईरान चीन और भारत की तरफ़ देखता है लेकिन इस बार सब कुछ बहुत आसान नहीं है. चीन के ख़िलाफ़ ट्रंप प्रशासन ने पहले से ही ट्रेड वॉर छेड़ रखा है. ईरान में लगातार बदतर स्थिति होती जा रही है. ईरान की मुद्रा रियाल इतिहास के सबसे निचले स्तर पर आ गई है. अनाधिकारिक बाज़ार में तो एक डॉलर के बदले एक लाख से ज़्यादा रियाल देने पड़ रहे हैं.
इस साल की शुरुआत में रियाल की क़ीमत डॉलर की तुलना में मौजूदा वक़्त से आधी से भी कम थी.
जुलाई में ईरान में 2012 के बाद पहली बार बड़ी संख्या में लोग सरकार के ख़िलाफ़ तेहरान की सड़कों पर उतरे थे. ईरान के पक्ष में कुछ भी सकारात्मक होता नहीं दिख रहा है. अमरीका ने सऊदी अरब को तेल का उत्पादन बढ़ान को लिए कहा है और सऊदी तैयार भी हो गया है. ईरान के पास विदेशी मुद्रा हासिल करने का कोई ज़रिया नहीं रहेगा क्योंकि वो तेल का भी निर्यात नहीं करने की स्थिति में होगा.
अमरीका दुनिया के तमाम तेल आयातक देशों पर ईरान से तेल नहीं ख़रीदने का दबाव बना रहा है. इन देशों में भारत भी शामिल है.
ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान से सबसे ज़्यादा तेल आयात करने वाला देश चीन संकट की घड़ी में क्या उसका साथ देगा? इस सवाल पर अमरीका में भी ख़ूब बहस हो रही है.
ईरान पर अमरीका के नए प्रतिबंधों की वजह से चीन के निजी सेक्टर प्रभावित नहीं होंगे और ऐसा ही यूरोप के साथ होगा. दूसरी तरफ़ ईरान के पास सीमित विकल्प हैं.
इसमें कोई शक नहीं है कि ईरान को केवल चीनी निवेश, निर्यात और तेल की ख़रीदारी से ही मदद मिल सकती है.

यूरोप का भी साथ नहीं

अमरीका ने जब परमाणु समझौते को ख़त्म किया तो ईरान ने यूरोप की तरफ़ रुख़ किया. ईरान ने कोशिश की कि यह परमाणु समझौता ख़त्म नहीं हो और इसी के तहत यूरोपीय यूनियन के अधिकारियों ने अपनी कंपनियों को प्रोत्साहित किया कि वो ईरान के साथ व्यापार और निवेश जारी रखें.
यूरोप की सरकारों ने ईरान के साथ कई छूटों का प्रस्ताव रखा और अमरीका से भी कहा कि उनकी कंपनियों को ईरान के साथ व्यापार करने दे.
अब यूरोप की कंपनियां भी नहीं सुन रही हैं. निवेश के मोर्चे पर पीएसए समूह ने ईरानी ऑटो मैन्युफ़ैक्चरर्स के साथ एक साझे उपक्रम को बंद करने का फ़ैसला किया.

इराक़ बन जाएगा ईरान?

ईरान के पहले उपराष्ट्रपति को सुधारवादी माना नेता माना जाता है. उन्होंने कहा था कि ईरान को सीधे अमरीका से बात करनी चाहिए. इशाक़ ने कहा है कि ईरान गंभीर 'इकनॉमिक वॉर' में जा रहा है और इसका नतीज़ा बहुत बुरा होगा.
उन्होंने कहा था कि ईरान को इस संकट से चीन और रूस भी नहीं निकाल सकते हैं. उनका कहना है कि अमरीका ही इस संकट से ईरान को निकाल सकता है.
अरमान अख़बार ने लिखा था कि ईरान आने वाले दिनों में और मुश्किल में होगा.
इस अख़बार ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के पूर्व राजदूत अली ख़ुर्रम के बयान को छापा था जिसमें उन्होंने कहा था, ''जिस तरह अमरीका ने इराक़ में सद्दाम हुसैन की सरकार को उखाड़ फेंका था उसी तरह से ईरान के लिए भी अमरीका ने योजना बनाई है. अमरीका ने इराक़ में यह काम तीन स्तरों पर किया था और ईरान में भी वैसा ही करने वाला है. पहले प्रतिबंध लगाएगा, फिर तेल और गैस के आयात को पूरी तरह से बाधित करेगा और आख़िर में सैन्य कार्रवाई करेगा.''

No comments:

Post a Comment